रोल को परखने के लिए कॉन्टैक्ट शीट बनाना और पढ़ना
में Simon Lehmann द्वारा लिखा गया Editor
एक ही एक्सपोज़र पर बनी प्रूफ शीट किस तरह पूरे रोल में नेगेटिव की डेन्सिटी और कंट्रास्ट उजागर करती है, और यह फ्रेम चुनने तथा प्रिंटिंग की प्री-विज़ुअलाइज़ेशन में कैसे मार्गदर्शन करती है।
एक्सपोज़ किया हुआ फिल्म का रोल अव्यक्त निर्णयों की एक क्रमबद्ध शृंखला होता है जो प्रिंट होने के बाद ही पठनीय बनती है। कॉन्टैक्ट शीट, या प्रूफ शीट, ऐसा पहला प्रिंट होता है: रोल के हर फ्रेम को एक ही कागज़ की शीट पर रखकर एक निश्चित सेटिंग पर एक्सपोज़ किया जाता है। चूँकि एक्सपोज़र फ्रेम-दर-फ्रेम नहीं बदलता, शीट एक तुलनात्मक उपकरण बन जाती है — न कि तैयार तस्वीरों का संग्रह। ग्रिड में टोन के अंतर सीधे नेगेटिव के अंतर से मेल खाते हैं, और यही बात प्रूफ को एडिटिंग के लिए उपयोगी बनाती है।
रोल को लेआउट करना
पूरे 36-एक्सपोज़र के 35mm रोल को छह-छह फ्रेम की छह पट्टियों में काटा जाता है और 20x25cm (8x10in) कागज़ की एक शीट पर प्रूफ किया जाता है; 6x6 फॉर्मेट के 120 रोल में बारह फ्रेम होते हैं जो कम और छोटी पट्टियों में फैले होते हैं। नेगेटिव की इमल्शन साइड को कागज़ की इमल्शन से सटाया जाता है, इसी वजह से रिबेट पर लिखे टेक्स्ट और फ्रेम नंबर तैयार प्रूफ पर सीधे दिखते हैं। पट्टियों और कागज़ को साफ काँच के नीचे या एक समर्पित कॉन्टैक्ट प्रिंटिंग फ्रेम में दबाकर सपाट रखा जाता है, और एनलार्जर हेड को ऊपर उठाकर बेसबोर्ड पर समान रोशनी फैलाई जाती है। Ansel Adams ने The Print (Adams and Baker, 1983) में एनलार्जर को डीफोकस करने की सलाह दी है ताकि लेंस तीखी इमेज की बजाय चिकनी और एकसमान रोशनी दे।
रेज़िन-कोटेड कागज़, जैसे Multigrade IV RC Deluxe, प्रूफिंग के लिए फाइबर की जगह परंपरागत विकल्प है: यह लगभग दो मिनट में धुल जाता है और मिनटों में सपाट सूख जाता है, जबकि फाइबर को बहुत लंबी वॉश और धीरे-धीरे घुमावदार सूखने की ज़रूरत होती है। जिस शीट का काम केवल पढ़ना और फाइल करना हो, उसके लिए यही तेज़ी ज़रूरी है।
स्टैंडर्ड एक्सपोज़र को कैलिब्रेट करना
प्रूफ का अनुशासन यह है कि एक सेटिंग पूरे रोल पर लागू होती है, इसलिए वह सेटिंग अनुमान से नहीं बल्कि कैलिब्रेशन से तय होनी चाहिए। Ilford की Making a Contact Sheet गाइडेंस के अनुसार औसत-डेन्सिटी नेगेटिव के लिए Multigrade RC पर f/8 पर लगभग 8 से 15 सेकंड का समय सही रहता है, लेकिन असली समय जानने का तरीका टेस्ट स्ट्रिप है: लेंस को f/8 पर सेट करें और 2, 4, 8, 16 और 32 सेकंड पर पाँच बैंड एक्सपोज़ करें — यह दोगुना करने की शृंखला है जिसमें हर बैंड एक स्टॉप के अंतर पर है। अगर हर बैंड बहुत हल्का आए तो f/4 पर शुरू करें; अगर हर बैंड बहुत गहरा आए तो f/16 पर जाएँ। मुँह नीचे करके डेवलप करें, और फिक्सर में 30 सेकंड के बाद स्ट्रिप को सामान्य रोशनी में परखा जा सकता है।
निर्णायक मानक है minimum time for maximum black: सही एक्सपोज़र वह सबसे कम समय है जिस पर फिल्म की साफ रिबेट और पट्टियों के बीच की खाली जगह, किसी नेगेटिव के बिना सीधे रोशनी पाने वाले कागज़ के अधिकतम काले से बस अलग न हो सके। उससे कम समय पर प्रूफ पतली दिखती है और डेन्सिटी झूठी होती है; उस समय पर कागज़ का काला स्थिर हो जाता है और हर फ्रेम को उसी आधार से परखा जाता है। एक बार मिल जाने पर हेड की ऊँचाई, एपर्चर और समय नोट कर लें। यह तिकड़ी उस फिल्म और कागज़ के संयोजन के लिए सेटिंग को दोहराने योग्य बनाती है — यही एक बार के प्रिंट और कैलिब्रेटेड उपकरण के बीच का फर्क है।
ग्रेड 2 सामान्य क्यों माना जाता है
Multigrade एक वेरिएबल-कंट्रास्ट कागज़ है: इसका कंट्रास्ट एक्सपोज़र से नहीं बल्कि फिल्ट्रेशन के रंग से तय होता है, और Multigrade फिल्टर 00 से 5 तक आधे-ग्रेड के चरणों में चलते हैं। हर ग्रेड एक नेगेटिव डेन्सिटी रेंज से मेल खाता है, जिसे ISO(R) मान (log exposure x100) में बताया जाता है। ग्रेड 00 लगभग R180, ग्रेड 0 लगभग R160, ग्रेड 2 लगभग R110, ग्रेड 4 लगभग R60 और ग्रेड 5 लगभग R40 पर रेट किया जाता है। ऊँचा ग्रेड यानी कड़ा कागज़ जो एक छोटी डेन्सिटी रेंज को प्रिंट के पूरे टोनल स्केल पर मैप करता है।
ग्रेड 2 इसीलिए “सामान्य” है क्योंकि इसकी R110 — लगभग 1.10 की नेगेटिव डेन्सिटी रेंज — वही है जो सही तरह से एक्सपोज़ और सामान्य रूप से डेवलप किया गया नेगेटिव देता है। एक व्यावहारिक बात: फिल्टर 00 से 3½ तक एक्सपोज़र फैक्टर 1 पर स्थिर रहता है और ग्रेड 4 और 5 पर केवल लगभग दोगुना होता है, इसलिए 00-3.5 रेंज में कहीं भी ग्रेड बदलने पर एक्सपोज़र का समय दोबारा तय नहीं करना पड़ता। ग्रेड 1 या 0 पर जाने से कागज़ की चौड़ी R रेंज असमान रूप से एक्सपोज़ फ्रेमों के बीच के अंतर को सिकोड़ती है और असंगत रोल में भी छाया व हाइलाइट विवरण बचाए रखती है; यही कारण है कि सर्वे प्रूफ के लिए कभी-कभी नरम ग्रेड बेहतर विकल्प होता है।
पड़ोसी फ्रेमों के मुकाबले डेन्सिटी और कंट्रास्ट पढ़ना
एक ही एक्सपोज़र पर टिका रहने से प्रूफ नेगेटिव की ईमानदार रिपोर्ट देता है, और सबसे उपयोगी पाठ हमेशा सापेक्षिक होता है: हर फ्रेम को उसी शीट पर उसके सही एक्सपोज़ फ्रेमों के मुकाबले देखें। मान लीजिए HP5 Plus का एक फ्रेम दो स्टॉप कम मीटर करके लिया गया और ID-11 1+1 में सामान्य रूप से डेवलप किया गया। वह नेगेटिव पतला है, इसलिए वह प्रूफ पर गहरा दिखता है: छाया कागज़ के काले में डूब जाती है और केवल सबसे चमकीली हाइलाइट अलग दिखती है, जबकि उसके बगल का सही एक्सपोज़ फ्रेम टोन की पूरी रेंज दिखाता है। प्रूफ ने बता दिया है कि एनलार्जिंग स्टेज पर उस फ्रेम का एक्सपोज़र बढ़ाना होगा, और सम्भवतः दबी हुई छाया वापस लाने के लिए ग्रेड भी एक घटाना होगा। घना, ओवरएक्सपोज़ड फ्रेम इसका उल्टा करता है — प्रूफ पर हल्का और फीका दिखता है।
कंट्रास्ट भी इसी तरह पढ़ा जाता है। फ्लैट रोशनी में लिया गया और N-minus डेवलपमेंट से गुज़रा नेगेटिव छोटी डेन्सिटी रेंज रखता है — शायद ग्रेड-2 के आदर्श 1.10 के मुकाबले 0.7। वह प्रूफ पर कोई साफ सफेद या काला न होने वाला मटमैला मध्य-ग्रे दिखता है, जो यह संकेत है कि अंतिम प्रिंट पर पूरा स्केल बनाने के लिए कड़े कागज़ — ग्रेड 4 या 5 — की ज़रूरत होगी। इस तरह प्रूफ एक साथ दो बातें पढ़ता है: डेन्सिटी, जो मीटरिंग और एक्सपोज़र से जुड़ी है, और कंट्रास्ट, जो डेवलपमेंट से।
प्रूफ की ईमानदारी के लिए प्रोसेसिंग
प्रूफ एक विश्वसनीय उपकरण तभी हो सकता है जब उसकी केमिस्ट्री स्थिर हो। Multigrade RC को Ilford Multigrade developer में 1+9 पर 20°C पर 60 सेकंड के लिए प्रोसेस करें, फिर सामान्य स्टॉप और फिक्स; देखने लायक डेन्सिटी फिक्सर में लगभग 30 सेकंड बाद स्थिर हो जाती है। डेवलपर का घोल, तापमान या समय बदलते रहने से प्रूफ की समग्र डेन्सिटी बदल जाती है और आपकी हर रीडिंग चुपचाप गलत हो जाती है।
एक आखिरी सुधार पढ़ने में है, बनाने में नहीं: RC प्रिंट ड्राई डाउन होते हैं। गीला आँका गया प्रूफ सूखने के बाद की उसी शीट से थोड़ा हल्का और ज़्यादा चमकदार लगता है, इसलिए डेन्सिटी सूखने के बाद परखें, या गीले में परखें तो ड्राई-डाउन का फर्क मन में रखें। यह बदलाव फाइबर के मुकाबले RC पर बहुत कम होता है, जो सूखने पर सिकुड़ता है, लेकिन गीले प्रूफ को मुँह के बल आँकें तो भी फ्रेम थोड़े पतले पढ़ सकते हैं। Ansel Adams भी proof और work print के बीच यही रेखा खींचते हैं: प्रूफ वह सर्वे है जिससे फ्रेम और प्रिंटिंग के निर्णय चुने जाते हैं, work print वह शुरुआती बिंदु है जिससे अंतिम प्रिंट की कल्पना की जाती है।
Image: “Washington, D.C. Developing microfilm” (1942), U.S. Office of War Information, Library of Congress, FSA/OWI Collection, public domain
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